क़तरा क़तरा ख़ून
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम, कश्मीर में निर्दोष नागरिकों पर हुए आतंकी हमले की घटना से प्रेरित
२२ - अप्रैल - २०२५
पहलगाम, कश्मीर
सब्ज़ कतरी घास पर मेरे बाबा की लाश ऐसे पड़ी हुई थी जैसे दूध पीता बच्चा अपनी माँ की गोद में, अपनी बड़ी बड़ी आँखों को मूँदे, अपने मासूम, नए नवेले ख़्वाबों को जन्म दे रहा हो। मेरे इर्द-गिर्द क़यामत का सा शोर बरपा था। एक आंटी थी जो अपने पति के देह से लिपट कर ईश्वर के करिश्मे का इंतज़ार कर रही थी। कुछ घंटे पहले एक ख़ुशनुमा हंस के जोड़े की तरह अपने पति की बाहों में बाहें डाल कर, अपनी नज़रों में जवानी के उन्हीं रंगों को समेटे हुए, जिन्हें उन्होंने ने किसी त्योहार के मौसम में अपने दरीचों पे रंगोली की शक्ल दी हो, अपने जीवनसाथी से मोहब्बत का ऐलान कर रही थी। पर हमें ये ख़बर कहाँ थी के कुछ अनजान साए, हमारे दरीचों पे मोहब्बत से निकाली हुई रंगोलियों को अपने बदतरीन, दाग़दार पैरों से कुचल डालेंगे। इन चंद मिनटों में मानो ऐसे मालूम हुआ जैसे आंटी के बालों में वादियों की बर्फ़ ने जगह बना ली हो, उम्र के पहाड़ों ने उनके कांधों में इतनी लचक पैदा कर दी हो के अब उनमें इतनी ताक़त ही न थी के वो संभल कर दो क़दम चल सकें।
मेरे दाहिनी ओर, लॉन के बिल्कुल बीचो बीच एक और औरत थी, आंटी के मुक़ाबले में ज़रा कमउम्र मालूम होती थी, उसके कत्थई फ़र कोट में लहू की महक चिनारों के दरख़्तों पे लहलहाते हुए पत्तों किसी तेज़ थी। उसका पति भी वहीं बाबा के बहुत क़रीब, सब्ज़ ज़मीन पर पड़ा मासूम ख़ामोशी के समुंदर में उतर गया था। और कुछ लोग थे जो हमारी ही तरह बेबस, लाचार, और ख़ौफ़ ज़दा थे, इसी उम्मीद में आँखों को दरिया किए जा रहे थे के कल जब दिन निकलेगा और आँख अपने होश ओ हवास लिए मुकम्मल शक्ल में खुल जाएगी, तब ये दहशत का तूफ़ान शायद थम जाए और महसूस हो के एक बुरा सपना था, मेरे बाबा सुबह आठ बजे वॉशरूम में शेव कर रहे हों, किसी का पति ऑफ़िस जाने के लिए अपनी शू लेसेस को कस के बांध रहा हो, किसी की पत्नी अपने पति को तौलिया पलंग पर रखने के लिए खरी खोटी सुना रही हो, कोई ऑफ़िसर अपने कमाए मेडलों की ओर देख अपने बाज़ुओं पे लगे ज़ख़्मों का सोच फ़ख़्र से मुस्कुरा रहा हो, कोई आदमी एक दफ़ा फिर अपने शिकारा को झेलम में उतारे चप्पूओं को लहरों में मारते हुए किसी पुराने गाने की धुन बना रहा हो। पर ये कोई सपना तो नहीं था, बुरे सपने भी इतने बुरे नहीं होते। हाँ, कश्मीर मेरे बाबा का सपना ज़रूर था।
क़रीबन रात के दस बज रहे होंगे, मैंने रूम का दरवाज़ा बंद किया और पलंग पर पैर जमाए ही थे के दस्तक की आवाज़ आई। दस्तक की आवाज़ से पहले खिड़की से अंदर आती हुई हवा क़िवाम की ख़ुशबू से मुअत्तर और ठंडी हो गई।
मेरे बाबा ने कहा ‘बेटे, अगर जल्दी सो नहीं रही हो तो अंदर आऊँ?’
बाबा एक सरकारी मुलाज़िम थे, और कुछ दो हफ़्ते पहले ही रिटायर हुए थे। मैंने कड़ी खोली तो पान को अपनी ज़बान के नीचे दबाए, मुस्कुराते हुए अपनी हल्की पीली आँखों से मुझे पलंग पर बैठने का इशारा किया और मेरे पास आकर बैठ गए। आँखों में मुस्कुराहट के ख़्वाबीदा जज़ीरों को भरे मुझसे कहने लगे,
‘कश्मीर चलें’
‘बाबा आप फिर से वही ज़िद करने लगे’ मैंने कतराते हुए लहजे में कहा।
‘देख यार छोटी, तेरे साथ नहीं जाऊँगा तो किस के साथ जाऊँगा---मेरे दोस्त बूढ़े हो चुके है, और कुछ ही दिनों में मेरी भी हड्डियाँ जवाब देने लगेंगी, तब तू कहेगी भी तो मैं नहीं आ पाऊँगा। तू जानती है ना मुझे कश्मीर जाए हुए अरसा हो गया है, पिछली बार तेरी माँ के साथ गया था, अब उसके जाने के बाद बस तेरे साथ एक बार वादियाँ घूमनी है। अपने बूढ़े रिटायर्ड बाप की आख़िरी ख़्वाहिश समझ कर चल बेटा, तब तुझे बताऊँगा के ज़मीन पर अगर कहीं जन्नत है तो वो कश्मीर में है।’ एक गहरी साँस लेते हुए बाबा ने कहा।
‘बाबा, आप को इतना भावुक होने की ज़रूरत नहीं है, आपकी पापा वाली पर्सनैलिटी पे सूट नहीं करता,’ मैंने बाबा की दाढ़ी से सुपारी का तिनका निकालते हुए कहा।
‘वैसे तो तू मानेगी नहीं,’
‘यू नो बाबा, ऑफ़िस के काम एंड ऑल’
‘हाँ हाँ, जानता हूँ, उनसे कह दे कि मेरे फ़ादर बीमार है,’ बाबा दुबक कर किसी गिलहरी की तरह अपने पैरों को अपनी जांघों तले दबाए चादर पर बैठ गए।
‘देखती हूँ’
‘ठीक है फिर, टिकट करा लेते है… तू, मैं और कश्मीर के ख़ूबसूरत पहाड़, बड़ा मज़ा आएगा’
‘मैंने ऐसे तो नहीं कहा,’
‘पर तूने वैसे भी नहीं कहा, हम जा रहे है बस’ बाबा एक असीम मुस्कान अपने होंठों के हवाले कर कमरे से चले गए।
हम लगातार सात दिनों से कश्मीर के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में घूम रहे थे, यहाँ की फ़िज़ा ख़ुशगवार, मौसम की दिलकशी ऐसी मानो कोई दुल्हन सजी बैठी हो। पर ये मौसम की दिलकशी बहुत देर तक न रहने वाली थी, ये हमारी ट्रिप का सातवाँ दिन था, और एक दिन बाद हमारी ट्रेन वापसी के लिए श्रीनगर से दिल्ली होते हुए अपने शहर की तरफ़ को हो लेती। हम पहलगाम की वादियों में हवा के रुख़ को चूमते हुए सब्ज़ कतरी हुई घास पर अपना छाता खोल कर बैठ गए। हालाँकि धूप की तेज़ी जिस्म पे यकदम मालूम न होती थी, मगर अगले दिन आईने में शक्ल ऐसी नज़र आती जैसे प्यासों की बस्ती में अकेले कुआँ खोद आए हो।
‘कश्मीर पहली बार आए हो, बेटा,’ आंटी जो हमारे बहिनी और एक छोटा टेंट डाले अपने पति के साथ कुर्सी पर बैठी थी उन्होंने ज़रा नज़दीक बढ़ते हुए, ज़ोर भरे अंदाज़ में पूछा।
‘हाँ जी आंटी, मेरे पापा पहले भी आए है, पर मैं पहली बार आई हूँ’
‘हम भी इतना दूर पहली बार ही आए है,’ आंटी ने थोड़ी झिझक के साथ ये कहा, और फिर बेबाकी का लहजा अपनाते हुए बोल पड़ी, ‘शिकारा मुझे बहुत पसंद आया और मेरे पति को भी… आपने किया है?’
तभी एक शोर सा पैदा हुआ और भगदड़ किसी सूरत बनने लगी। धूप की तमाज़त अब जिस्मों पे बिजली की तरह मालूम होती थी। चार पाँच ऊँचे क़द के हैवान, इंसानों की शक्ल लिए हमारी ओर बढ़ रहे थे। उनकी गर्दनों पे उभरी हुई नसों में सियाह लहू बह रहा था, जो ऊपर से दिखाई तो न देता था मगर उनके दिमाग़ों में नफ़रत का इतना ज़हर भर देता, के मासूम और गुनहगार का फ़र्क़ ही मिट जाता। और इसी लहू की बदौलत उनके हाथों में लंबे लंबे हथियार थे, शैतानी मुस्कुराहट उनके होंठों पर बिल्कुल वाज़ेह थी।
पहली गोली की आवाज़ सुनाई दी और फिर गोलियों की बौछार पड़ने लगी, मानो किसी पीतल के ख़ाली बर्तन में आसमान ओले बरसा रहा हो। धीरे धीरे गोलियों की आवाज़ों और लोगों की चीख़ों में फ़र्क़ करना मुश्किल सा हो गया। फिर उनमें से तीन हैवानों ने अपनी पूरी ताक़त के साथ गोलियाँ चलाई, उनकी बंदूकों की नालियाँ किसी एक रास्ते पर न चलती, एक लम्हे को इस जानिब तो दूसरे को किसी और। उनसे निकलती हुई गोलियाँ किसी मर्द की पीठ को शहद के ख़ाली छत्ते की तरह छलनी करते हुई, या किसी औरत की गर्दन के गरम लहू से अपने कठोर बदन को तर करते हुए, किसी न किसी के जिस्म में अपना घर बना ही लेती।
जब उन्होंने ये अंधाधुंध फ़ायरिंग बंद की, और लोगों को बंदी होने का एहसास कराया, तब उनमें से एक हैवान उस कमउम्र औरत की तरफ़ बढ़ा, आँखों में ख़ून लिए उसने उस औरत की तरफ़ देखा और अपनी बंदूक औरत के माथे पर तान दी। औरत के हाथों में लाल चूड़ियाँ थी, शायद शादी को मुश्किल से कुछ हफ़्ते ही बीते होंगे। ख़ौफ़ के मारे औरत की साँस रुक सी गई, ज़ेहन पे जैसे काला पर्दा पड़ गया हो। उसके पति ने हाथ जोड़ते हुए माफ़ी मांगी, उसकी आँखों से भी आँसू बहने लगे पर ज्योंही ही अपनी बीवी की जान का डर उसके दिल तक पहुँचा, उसके बहते हुए आँसू एक दम ठहर से गए और हाथ काँपने लगे, पैरों ने ज़मीन छोड़ने की दावत दी, मुँह खुला का खुला रह गया, ज़ोर ओ शोर से धड़कता हुआ दिल किसी दम तोड़ती हुई मछली की तरह आख़िरी कुछ साँसें गिनने लगा, और अचानक उसके सीने से ख़ून रिसने लगा, कुछ देर तो औरत की समझ में न आया पर जब ख़ून के गहरे सुर्ख़ रंग में आदमी का शर्ट पूरी तरह से भीग गया और उसके सीने की आख़िरी धड़कन ने भी दम तोड़ दिया, तब औरत अपने पति की लाश के पास ऐसे गिरी जैसे कोई बूढ़ी इमारत देखते देखते ज़मीन में दफ़ना दी गई हो। चूड़ियों का रंग ख़ून की सूरत में उसके पति के बदन से निकलता रहा और मिट्टी में आकर थम गया।
उन्हीं में से दूसरा हैवान, एक आदमी को सामने ले आया, उसके शर्ट की जेब में उस हैवान ने अपनी बंदूक की नाली रखी हुई थी। उसकी घिनौनी मुस्कुराहट से नफ़रत की बू आ रही थी, उसने कहा,
‘क्या नाम है?’
आदमी ने डरते डरते, काँपते हुए होंठों से अपना नाम बताने की कोशिश की, पर आवाज़ गले में ही अटक के रह गई। उसके बाद उस हैवान ने बन्दूक उसकी जेब से निकाल कर उसकी पैंट की तरफ़ मोड़ दी और उस आदमी को पैंट उतारने का इशारा करने लगा।
जब आदमी ने अपनी पैंट उतार दी तब हैवान का माथा जैसे चमक सा गया। फिर आदमी से पूछने लगा:
‘हिंदू हो?’
आदमी ने डरते हुए अपना सर हिलाया। अभी उसने पूरी तरह सर हिलाया भी न था के दो गोलियाँ उसके सीने के बहुत अंदर तक जा पहुँची।
वही हैवान जोश ओ ख़रोश के साथ चलते हुए आंटी के पास चला आया। उसने आंटी को बड़े ग़ौर से देखा, तभी उनके पति सामने आकर खड़े हो गए। ये बात जैसे उस हैवान को नागवार गुज़री, उसने उन्हें घूमने को कहा, अपनी बंदूक उनकी रीढ़ की हड्डी पे रखी और ट्रिगर दबा दिया।
आंटी वहीं पर चीख़ते हुए गिर पड़ी, फिर कुछ लम्हे बाद बेबाकी से उस हैवान को कहने लगी ‘मेरे पति को मार दिया है, मुझे क्यूँ नहीं मार देते---’
‘ताकि तुम ये पैग़ाम अपने वज़ीर ए आज़म को दो, इसलिए तुम्हें ज़िंदा छोड़ रहे है।’ हैवान ने कहा
‘तुम्हारी बातों से नफ़रत झलकती है---और ये तुम जो मज़हब का ताज पहने बैठे हो, जिसकी आड़ में ये ख़ून ख़राबा, ये बंदूकें, ये नफ़रत, उसको पढ़ने या समझने की कोशिश भी की है---अगर करते तो जान जाते कि एक मासूम का ख़ून पूरी इंसानियत का ख़ून होता है, आज तुमने कितने मासूमों का ख़ून बहाया है---पर तुम्हें ये बात नहीं समझ आएगी, क्यूंकि तुम नफ़रत करते हो----अगर तुम मौत से डराना चाहते हो, तो अब मुझे डर नहीं है, गोली चलाओ और ख़त्म करो, मेरे पति की लाश मुझसे देखी नहीं जाती’
आंटी ये सब कुछ कह ही रही थी के इतने में काले रंग की मिट्टी लगी हुई शर्ट पहना एक आदमी रोते हुए इंसानी हुजूम के बीच से आ निकला और उस हैवान के कंधे पर एक ज़ोर का धक्का दिया, हैवान के पैर लड़खड़ाए पर वो ज़मीन पर न गिर सका। काले शर्ट वाले ने उसके एक बाज़ू को कस के पकड़ लिया था जिसकी वजह से वो अपनी बंदूक के ट्रिगर तक नहीं पहुँच पा रहा था, हैवान चीख़ने लगा और ग़ैर मामूली तौर से अपने पैरों को ज़मीन पर पटकने लगा, फिर अपना खुला बाज़ू उस नौजवान की छाती पर ज़ोर ज़ोर से मारने लगा। चंद मिनट दोनों इसी तरह लड़ते रहे, और इसी बीच कुछ लोग जो वादी की पिछली ओर थे, भागने में कामयाब हो गए।
‘तुम इन्सान हो या हैवान, ये मासूम लोग हैं, इन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा है।’ नौजवान ने घुटी हुई आवाज़ में कहा।
नौजवान की गर्दन उस हैवान की गिरफ्त में थी, और नौजवान का हाथ बन्दूक पर, वो अपनी पूरी ताक़त से उसकी हथेली को खोलने की कोशिश कर रहा था ताकि बन्दूक पर किसी तरह पकड़ पा सके और साथ ही साथ उसे यह सब कहता जा रहा था। हैवान कुछ लम्हे को तो चुप रहा लेकिन फिर नौजवान की बातों से तंग आकर, भारी भारी साँसें ले कर कहने लगा,
‘तुम इन्सान नहीं समझते तो न सही, जानवर समझ लो, जानवर हैं हम लोग।’
नौजवान ने झपट्टे से उसके हाथ पर, जो उसकी गर्दन को घेरे हुए था, अपनी बंद मुट्ठी दे मारी और हाँफते हुए उससे कहा,
‘तुम जानवर तक कहलाने लायक़ नहीं हो, जानवर तुम्हारी तरह किसी का मज़हब पूछकर हमला नहीं करता।’
हैवान ने अपनी एक उँगली का नाखून उसकी गर्दन में चुभो दिया जिसकी वजह से वो नौजवान ढीला सा पड़ गया, पर कोशिश करता रहा कि बन्दूक पर जैसे तैसे क़ाबू पा ले।
कुछ ही देर में उसके दो साथी अगले छोर से निकल आए और उस नौजवान के सर में चार गोलियाँ दाग़ दी और उसकी लाश को गालियाँ बकने लगे।
फ़िज़ा इस दर्जा नमनाक हो गई जैसे किसी ज़हर आलूद झोंके ने साफ़ शफ़्फ़ाफ़ हवाओं का गला घोंट दिया हो। चारों तरफ़ से चीख़ों का शोर कानों पर भारी पत्थर की तरह पड़ने लगा। बाबा ने मुझे अपनी ओर खींचा, उनकी साँसें समुंदर की लहरों जितनी तेज़ और उन लहरों को काटते हुए जहाज़ों की तरह भारी मालूम होती थी। मैंने बाबा के सीने पर सर रक्खा और बाबा ने मेरे गरम माथे पर शफ़क़त से हाथ फेरा। फिर से मासूम चीख़ें हवाओं में गुंजने लगीं, मानो बाहर जाने का रास्ता तलाश कर रही हों पर देवदार के ऊँचे ऊँचे दरख़्त जेल की सलाख़ों की तरह उन्हें रोके हुए हों।
फिर उन्हीं में से एक जिसने उस बहादुर नौजवान को गोली मारी थी, रास्ते की कुर्सियों को लात मारते हुए हमारी और बढ़ा। इर्द गिर्द छे लाशें पड़ी थी, आसमान की तरफ़ नज़रें गड़ाए, उनके बग़ल में कुछ औरतें मुर्दा जिस्मों से लिपट कर उन्हें वापस आने का हुक्म दे रही थी। हैवान को आते देख उनके आँसुओं में रुकावट ज़रूर पैदा हुई पर उनकी बेख़ौफ़ आँखों में डर का कोई मंज़र बाक़ी न था। बंदूक की गोलियाँ, या तलवारें, या असलाह-बारूद अब उन्हें डराने के क़ाबिल नहीं थे। कोई अपनी ज़िंदगी भर का सरमाया खो चुका था, तो कोई अपनी ज़िंदगी।
बंदूक से निकलती हुई बारूद की बू हवा में तेज़ हुई, हैवान ने बाबा को इशारा किया, मेरे बदन के पुरज़े पुरज़े में एक धड़का सा पैदा हुआ, ख़ौफ़ के काले बादल मानो जिस्म में ख़ून की तरह बह रहे हो, पैर पसीने में तर हो गए, पेशानी पुरज़ोर सर्दी में नंगे बदन किसी काँपने लगी, आँखों में आँसुओं से जूझने की सुकत न रही। मैंने कहा ‘बाबा मत जाइए’ हैवान ने एक नज़र मेरी और देखा और बाबा को कॉलर से घसीटते हुए मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया।
उसने कहा ‘कलमा पढ़ो’
‘याद नहीं’ बाबा ने जवाब दिया
मैं बाबा की आँखों में देखती रही, उनका चेहरा ख़ौफ़ के मारे ज़र्द हो चुका था, उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, मुस्कुराना चाहते थे पर मुस्कुरा नहीं पाए, शायद ये सोचकर के उनके बाद मेरा क्या होगा। उन्होंने आँखों को एक लम्हे के लिए मूंदा और फिर खोल दिया, मानो माँ को याद कर रहे हो, मेरी आँखों से दो आँसू के क़तरे ज़मीन पर पैरों के बीच आकर गिरे और मेरे बाबा का लहू उनकी गर्दन से फूटते हुए मेरे रुख़सार पर आ बैठा।
यक़ायक़ एक आवाज़ मेरे क़रीब आई, आँखों में इन्हीं वादियों की तरह कोहरा सा छाया हुआ था, और तपते आँसू अंदर ग़ैर मामूली शिद्दत से उबलने लगे जैसे झेलम में सैलाब आया हो। बाबा के गर्दन और पिछले सर से क़तरा क़तरा ख़ून मेरे हाथों को भिगोता रहा और आवाज़ तेज़ होती गई---
‘बाबा की आख़िरी ख़्वाहिश समझ कर चल बेटा, तब बताऊँगा तुझे अगर ज़मीन पर कहीं जन्नत है तो वो कश्मीर में है।’
Disclaimer: This short story is a fictionalized portrayal of a real-life terror attack on innocent tourists in Pahalgam, Kashmir on 22 April, 2025. The pain of the families who lost their loved ones in this horrific incident is much more potent and cannot be fully-described in few words.


